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Tuesday, September 13, 2011

हमें फिर से जमाना अच्छा लगा

वादा था मर जायेंगे तुम्हारी एक ख्वाहिश पर
उन्होंने जान मांगी, और हमें मर जाना अच्छा लगा

नफरत थी हमें जिससे, उन्हें उसी से मोहब्बत थी
हमे फिर अपनी ही नफरत पर,प्यार जताना अच्छा लगा

इन्तेजार किया ,करते रहे, तकलीफे लाख हम सहते रहे
उनको देखा इन्तेजार के बाद,तो तकलीफे उठाना अच्छा लगा

भूल गए थे हम मुस्कुराना, दिल पर लगी चोटों से
देख कर प्यार से मुस्कुराए, हमें फिर से मुस्कुराना अच्छा लगा

जख्म इतने मिले थे जमाने से के नफरत हो गई थी हमे इससे
आप मिले इसी जमाने से, हमें फिर से जमाना अच्छा लगा



8 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 15 -09 - 2011 को यहाँ भी है

...नयी पुरानी हलचल में ... आईनों के शहर का वो शख्स था

Geeta said...

bohot khub

रेखा said...

वाह ......अंदाज पसंद आया

श्रीप्रकाश डिमरी /Sriprakash Dimri said...

भूल गए थे हम मुस्कुराना, दिल पर लगी चोटों से
देख कर प्यार से मुस्कुराए, हमें फिर से मुस्कुराना अच्छा लगा
बेहतरीन गजल ...शुभकामनायें !!!

सुनीता शानू said...

बहुत खूब!

अनामिका की सदायें ...... said...

ye sab acchha laga to fir shikayat kaisi janaab...lutf uthate jaiye.

रचना दीक्षित said...

खूबसूरत अंदाज़

ASHOK BIRLA said...

behatrin sir ji awsmmm.....

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