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Sunday, July 10, 2011

किन्नरों की दुवायें और उसकी कीमत

आज आशीष के बेटे को हुए सवा महीने हों चुके थे. यूँ तो वो एक बड़ा जलसा करना चाहता था लेकिन सीमित आमदनी और कर्ज ना मिल पाने की मजबूरी में एक छोटी सी पूजा कर के बच्चे की सूरज पूजा का कार्यक्रम कर रहा था

पूजा हों ही रही थी और जाने कहाँ से कुछ किन्नर अपना नेग मांगने के लिए. आशीष ने अपनी जेब से १५१ रूपये निकाले बच्चे पर न्योछावर कर के उन किन्नरों को श्रद्धा के साथ दिए और बदले में तिरस्कार वाली गाली सुन कर पीछे हट गया

हमें भिखारी समझ रखा है क्या, ५१०० रूपये चाहिये लड़का हुआ है, वो यही सोच रहा था की ५१०० रूपये इन्हें कहाँ से देगा उसके पास तो कुल ३००० रूपये हैं जिसमे पूजा भी करना है पंडित जी को दक्षिणा भी देना है और महीने भर का खर्च भी चलाना है 

उसने हाथ जोड़े, पैर पड़े पर किन्नर ना माने, अब तो वो घर का सामान फैंकने लगे थे, बच्चे को माँ के हाथो से छीन लिया था, बददुआएं देने की धमकी दे रहे थे जिसे सुन कर आस पास वाले आशीष को समझाते हुए बोले मान जाओ इनकी दुआ और बददुआ में बहुत ताकत होती है, जैसे तैसे कर के किन्नर २१०० रूपये पर माने, उत्पात मचाना बंद किया और पैसे के बदले दुआएं बेच कर चले गए.

अब पूजा हुई बचे हुए ९०० रूपये में से पंडित जी पहले से तय दक्षिणा के ५०० रूपये ले कर चले गए, कम करने की गुजारिश पर पंडित के पैसे कम करने की चाहत के लिए फटकार मिली और पंडित जी से नर्क जाने का रास्ता तय्यार करने वाली दलील अलग सुनने को मिली.

अब आशीष की जेब में कुल ४०० रूपये बचे थे और रात होते होते बुखार से बच्चे की तबियत बिगड़ने लगी. जब अस्पताल ले कर पहुंचा तो वहाँ कहा गया २००० रूपये जमा करो बच्चे को भरती करना पड़ेगा, सुबह तक पैसे जमा करने की दलील सुनने पर कहा गया तो सुबह ले कर आना.

आशीष बच्चे को ले कर घर वापस आ चूका था, लेकिन सुबह होते होते बच्चे का तपता बदन पूरी तरह से ठंडा हों चूका था और अब उस नन्हे से शरीर में जान नहीं थी, बस शरीर ही बचा था.

सुबह वो बचे हुए ४०० रूपये बच्चे के कफन में खर्च हों रहे थे

सब कह रहे थे देखो किन्नरों की बददुआ का असर है ये, के बच्चा रात भर भी ना बचा.

और आशीष सोच रहा था काश मैंने २१०० रूपये न दे कर किन्नरों से बददुआएं ही ले ली होती तो शायद मेरा बच्चा जिन्दा होता

***************************************** 
ये कहानी मैंने मेरे एक सच्चे अनुभव पर ही लिखी है .... मैंने एक आलेख लिखा था करीब १ साल पहले उसी के आधार पर ये कहानी ४ दिन पहले दिमाग में जन्मी थी

उस लेख का शीर्षक था "किन्नरों की गुंडागर्दी और नपुंसक भारतीय मानसिकता"



कभी  उस आलेख को भी पोस्ट करूँगा

11 comments:

SACCHAI said...

" ek khubasoorat ...dil ko jinjodnewali kahani "

http://eksacchai.blogspot.com

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत मार्मिक कहानी ... ऐसी परम्पराओं के वशीभूत हो कर हम लोंग स्वयं का कितना नुक्सान कर लेते हैं ... जागरूक करती हुई यह कहानी पसंद आई

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (11-7-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

Rajesh Kumari said...

bahut marmik rachna padhkar bahut dukh ho raha hai.sahi me kinnaron ki jyadati har jagah dekhne ko mil jaati hai.kya gharon ke utsav kya train.kinnaron ke is dusahas ka sabhi ko milkar virodh karna chahiye.bahut prabhaavshali lekh.

Kailash C Sharma said...

बहुत मार्मिक कहानी जो आज का कटु सत्य है..

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आज आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


...आज के कुछ खास चिट्ठे ...आपकी नज़र .तेताला पर
____________________________________

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपने तो सत्यता को प्रकट कर दिया!

(कुंदन) said...

तुलसी भाई ये भी एक सच्चाई ही है

संगीता जी यहाँ सिर्फ आम इंसान नहीं पुलिस वाले भी डरते हैं इन लोगो से तो और उनकी बद्दुआओं से

वंदना जी बहुत बहुत धन्यवाद चर्चामंच पर स्थान देने के लिए

राजेश कुमारी जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद .... आपका कहना सही है लेकिन हमारी पिछली पीढ़ी के कारन आज की
मानसिकता नपुंसक हों चुकी है कई मामलो में ... माफ़ी चाहूँगा लेकिन मै यही महसूस करता हूँ .... मैंने जब मेरे घर पर विरोध करा था तो मैंने यही अनुभव करा था

कैलाश सर धन्यवाद

संगीता जी तेताला पर स्थान देने के लिए धन्यवाद

डॉ साहब आपका बहुत बहुत धन्यवाद और आभार

आपका कमेन्ट बड़ा महत्वपूर्ण है मेरे लिए क्योंकी आपके कमेन्ट से मेरे ब्लॉग पर २०० कमेन्ट पूरे हों गए हैं

संजय भास्कर said...

आज का कटु सत्य है...

नीरज गोस्वामी said...

सच्चाई को बहुत निर्ममता से प्रस्तुत किया है आपने...हमारे मन का दर हमसे ऐसे काम करवाता जिसे दिमाग नहीं कबूल करता लेकिन हम फिर भी करते हैं...प्रेरक लेख.
नीरज

Geeta said...

oh sun kar bohot dukh hua, baad mei is line ka matlab samjhi ke ashish ne aisa kyun kaha ke rupaye ke badle unki baddua hi le leta to mera bacha bach jata, sach mei kinnaro ki jad ti bohot hai, or bade budhe log bhi ye hi kehte sune hai ki inki bad dua nahi leni chaiye, ab kitni sachchai hai ye mai nahi janti

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