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Monday, May 23, 2011

तुझसे बहोत प्यार करते हैं

आज फिर


आज फिर, वो ही याद
दिल को झकझोर रही है.

आज फिर, वो हवा मेरे होठो
पर एक पपड़ी जमा रही है

आज फिर, मेरी आँखों से
एक नमकीन नदी बहती जा रही है.

आज फिर, मुझे तेरी याद आ रही है
और आज फिर, तेरी वो याद मुझे रुला रही है


आज फिर, चाँद के पूरा होने पर भी
चाँदनी अधूरी ही आ रही है .

आज फिर, गर्मी की शाम मे
नजर कुहरे से धुंधला रही है .

आज फिर, तेरी वो
अल्हड हंसी याद आ रही है,

और आज फिर,
तेरी वो याद मुझे रुला रही है.


आज फिर, मेरे कदम
घर की और जाने से इंकार करते हैं..

आज फिर, मेरे लब
तुझसे मेरे इश्क का इजहार करते है..


आज फिर, मेरे कंधे
तेरे सर के टिकने का इन्तेजार करते हैं.

क्या करे मगर, हाँ ये सच है
हम अब भी तुझसे बहोत प्यार करते हैं.
और तेरी याद के की तड़प से 
मेरी आँखों से कई सैलाब निकलते हैं 


4 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

ये याद ही है जो इतना रुलाती है ..अच्छी प्रस्तुति

संजय भास्कर said...

कुछ तो है इस कविता में, जो मन को छू गयी।

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

व्याकुल भावों की आकुल रचना....

विरह की वेदना से भरी हुई रचना....

(कुंदन) said...

जी पसंद करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

दिल की बात थी दिल से लिख दी नहीं तो मुझे लिखना नहीं आता मै सिर्फ यही कहता हूँ

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