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Thursday, August 11, 2011

डाल से टूटा एक पत्ता हूँ

जल्द ही सूख कर बिखर जाऊँगा

अब कोई ओस की बूँद
नहीं टिकेगी मेरे किनारों पर
अब नहीं मिलेगी छाँव किसी
थके पथिक को मेरी शरण मे आने पर

अब मै हवाओ के चलने पर
कभी लहरा नहीं पाऊँगा
अब मै हवाओ के गुजरने पर
कोई गीत नहीं गा पाऊँगा

हवाएं तो मूझे अब यहाँ से वहाँ उड़ायेंगी
फिर जल्द ही मेरी नमी भी खो जायेगी

जल्द ही मै रंगीन से बेरंग हों जाऊँगा

मै तो डाल से टूटा एक पत्ता हूँ
जल्द ही सूख कर बिखर जाऊँगा

3 comments:

अनुपमा त्रिपाठी... said...

क्षणभंगुर जीवन पर सुंदर मन के भाव..!!

वन्दना said...

यही है ज़िन्दगी का सच्।

संजय भास्कर said...

बहुत सुंदर रचना ... आपने शब्दों को बहुत ख़ूबसूरती से पिरोया है ... शुभकामनाएं

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