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Tuesday, July 19, 2011

मेरी छोटी सी गुडिया

क्या कहू कर पुकारूं तुझको
मेरी छोटी सी गुडिया
तू तो है जैसे
कोई खुशी की पुडिया

कहूँ मै ये की
तू खुशियों की दाती है
के जब तू प्यार से
पापा पापा कह के बुलाती है
तो लगता है
जैसे जग की सारी खुशिया
मेरे आंगन में चली आती है
तेरे जरा से रोने से
मेरा तन मन रोने लग जाता है
तेरे एक मुस्का भर देने से
मेरा मन भी खुश हों जाता है

तेरी मुस्कान से बनती है
खुशियों वाली लाडियां

क्या कहू कर पुकारूं तुझको
मेरी छोटी सी गुडिया
तू तो है जैसे
कोई खुशी की पुडिया

या कहूँ मै ये के
तू समय की धारा है
के तुने तेरे इस बचपन में
मेरे गुजर चुके उस बचपन को
आदेश दे कर के पुकारा है
के तेरे होने से
मै मेरे गुजरे बचपन को
तेरे संग संग फिर से जीता हूँ
तेरे साथ ही मै भी फिर से
माँ से छुप कर के
वो ठंडा वाला शर्बत पीता हूँ

बस तेरे होने भर से
जुड जाती है जीवन की
टूटी हुई कई कड़ियाँ

क्या कहू कर पुकारूं तुझको
मेरी छोटी सी गुडिया
तू तो है जैसे
कोई खुशी की पुडिया


या कहूँ मै ये के
तू सम्मोहन की देवी है
तेरी मोहकता तो
सारे जग को सम्मोहित कर लेती है
क्या चंदा और क्या सूरज
तू सभी को बार बार तुझे देखने
को विवश कर देती है
तेरी मोहकता से
मोहित हों कर तो
समय भी धीमे कर देता घडियां

क्या कहू कर पुकारूं तुझको
मेरी छोटी सी गुडिया
तू तो है जैसे
कोई खुशी की पुडिया


या कहूँ मै ये के
तू सुंदरता का प्रतिमान है
क्या तुलना करूँ तेरे रूप की
सुंदरता के पैमाने पर
जग में दूजा कौन तेरे सामान है

तेरे रूप में बचपन की
मासूमियत और सच्चाई भी है
तेरी भोली सूरत में
इश्वर और खुदाई भी है

तेरा रूप की कोमलता जैसी
क्या होंगी फूलों की पंखुड़ियां

क्या कहू कर पुकारूं तुझको
मेरी छोटी सी गुडिया
तू तो है जैसे
कोई खुशी की पुडिया

या मै कहूँ ये
के तू है शैतानों की नानी
क्यूंकि तू है मासूम और सुंदर
पर करती है बड़ी बड़ी शैतानी
तू कभी तो छुपा लेती है
चंदा को अपनी नन्ही मुट्ठी में
और कभी सूरज को भी
कर देती है चाँद के जैसे ठंडा
कभी तेरी शरारतों
को मेरी बता कर के
तू मुझ पर चलाती है
दादा जी वो पुराना डंडा

और कभी ऐसी
शांति की मूरत है बन जाती
जैसे कोई बहुत उम्र की बुढिया

क्या कहू कर पुकारूं तुझको
मेरी छोटी सी गुडिया
तू तो है जैसे
कोई खुशी की पुडिया

5 comments:

वन्दना said...

वाह कुन्दन बहुत सुन्दर चित्रण किया है।

संजय भास्कर said...

हर शब्‍द बहुत कुछ कहता हुआ, बेहतरीन सुन्दर चित्रण किया है।

संजय भास्कर said...

मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत है
' नीम ' पेड़ एक गुण अनेक..........>>> संजय भास्कर
http://sanjaybhaskar.blogspot.com/2011/07/blog-post_19.html

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपकी प्रवि्ष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल उद्देश्य से दी जा रही है!

दिगम्बर नासवा said...

बच्चे सच में खुशियाँ ले कर आते हैं ...
लाजवाब लेखन है ...

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