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Wednesday, June 8, 2011

जिंदगी

आज क्या लिखू कुछ समझ नहीं पा रहा
सोचा लिखू जिंदगी के बारे में कुछ

फिर देखता हूँ जिंदगी में ढेरो बाते हैं
लेकिन हर बात में एक सवाल है

सोचता हूँ जिंदगी को मै जब
तो लगता है जिंदगी एक अजीब बवाल है

कभी भागता हूँ दूर इस जिंदगी की कश्मकश से
तो कभी लगता है यही जिंदगी एक कमाल है

कभी ढूँढता हूँ मै जब अकेलापन
तो जिंदगी भीड़ में ले जाती है

और जब चाहता हूँ जब भीड़ में चलना
तो खुद मेरी परछाई भी नजर नहीं आती है

कभी कहता हूँ जिंदगी से थोडा ठहर जा
तो जबरन मुझे आगे ले जाती है

और जब चाहता हूँ मै आगे जाना
तो बेवजह एक लंबा ठहराव दे जाती है

कभी मांगता हूँ जिंदगी से एक छोटी सी हंसी की
तो ढेरो आंसू मिल जाते हैं

और जब कभी उम्मीद करता हूँ आंसुओ की
तो हर मोड पर ठहाके लग जाते हैं

सोचता हूँ जिंदगी को तो लगता है ये एक बवाल है
लेकिन शायद जिंदगी का यही सबसे बड़ा कमाल है

3 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

कभी मांगता हूँ जिंदगी से एक छोटी सी हंसी की
तो ढेरो आंसू मिल जाते हैं

और जब कभी उम्मीद करता हूँ आंसुओ की
तो हर मोड पर ठहाके लग जाते हैं
--
बहुत सुन्दर रचना!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

संवेदनशील रचना

वन्दना said...

बहुत सुन्दर भावाव्यक्ति।

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