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Thursday, June 9, 2011

जब बेटी थोड़ी बड़ी हो जायेगी

सोचता हूँ क्या
ये दिन फिर कभी
मुझे मिल पाएंगे
जो यदि आज
मैंने इन दिनों को
ना जिया और
कैद ना किया अपनी
यादो की तिजोरी में

सोचता हूँ क्या
कुछ सालो बाद भी
मेरी सुबह
आज ही की तरह
बेटी की
मासूम आवाज में
पापा शब्द के मधुर
कलरव को सुनकर
और उसके सुन्दर
मुख पर खेलती
मोहक मुस्कान
को देख कर होगी

सोचता हूँ, आज
जब वो अपने
नन्हे नन्हे हाथो से
मेरी ऊँगली पकड़
कर मुझे जगाने की
कोशिश में सफल
हो जाती है,
तो उसके मुख पर
बिखरी हंसी में
प्रसन्नता का जो
अद्भुत संगम होता है
क्या वही
हंसी और प्रसन्नता
का अदभुत संगम
मुझे आज से कुछ
साल बाद भी
देखने को मिलेगा
सोचता ये भी हूँ
की क्या वो
आज से कुछ सालो
बाद मुझे सोते से
तब जगायेगी भी
जब वो थोड़ी
बड़ी हो जायेगी

सोचता हूँ
बेटी का मुझ पर
मा के जैसे
आदेश चलाना
और माँ की
ही तरह
ब्रुश ले कर सिरहाने
खड़े हो जाना
और अपने नन्हे नन्हे
हांथो से दांत साफ
करवाना
अपने नन्हे नन्हे
हाथो से खाना खिलाना
क्या मासूम बेटी का प्यार
माँ की ममता
से कही कम है
क्या बेटी का ये
ममता मयी प्यार
तब भी मिलेगा
जब वो थोड़ी
बड़ी हो जायेगी

सोचता हूँ
घर से कही
आने या जाने
के पहले बेटी
को दोपहिया से
पूरे मोहल्ले का चक्कर
लगा कर घुमाने
की जो चुंगी
आज देना होती है
क्या बेटी यही चुंगी
तब भी चाहेगी
जब वो थोड़ी
बड़ी हो जायेगी

सोचता हूँ
आज उसके लिए
एक पूरी दुनिया
मै ही हूँ
लेकिन क्या
कल मै इस बात
को स्वीकार कर पाऊँगा
जब उसकी दुनिया में
मेरी जगह तब
कम हो जायगी
जब वो थोड़ी
बड़ी हो जायेगी


सोचता हूँ
आज मेरे लैपटॉप और फोन
पर अपना पूरा हक दिखाती है
मेरी किसी भी वस्तु
को किसी और के
छूने पर भी गुर्राती है
और जमीन पर गिर
जाने से लगी चोट पर
जमीन की शिकायत
मुझसे करने आती है
क्या कल भी
वो इसी तरह
हक दिखाएगी
गुर्राएगी और शिकायत
तब भी ले कर आएगी
जब वो थोड़ी
बड़ी हो जायेगी

सोचता हूँ
पालने में सोने पर
मुझ से लोरियां
सुनने के लिए
खुद भी गाती है
चाहे कितना भी बुरा
गाता रहूँ मै
वो बड़े चैन से
सो जाती है
लेकिन क्या कल
वो मेरी बेसुरी
आवाज में किसी
लोरी के गाने पर भी
इतना ही चैन से
सो पायेगी तब
जब वो थोड़ी
बड़ी हो जायेगी

तब जब वो
थोड़ी बड़ी हो जायेगी

सोचता हूँ
मेरे स्वार्थी मन
के वशीभूत हो कर
रोक लूं मै समय को
और ये बचपन यही
ठहर जाये
हमेशा जागू मै
उसी एक आवाज में
पापा शब्द के
मधुर कलरव को सुन कर
देखता रहूँ वो
आन्नंद से परिपूर्ण
हंसी हर दिवस
प्रात: उठ कर
लेता रहूँ आदेश
बेटी से हर दिवस
और पाता रहूँ
वो ममतामयी प्रेम
चुकाता रहूँ
वो निश्छल प्रेम
से सराबोर चुंगी
और मेरी हर वस्तु
पर उसका अधिकार
ऐसे ही बना रहे
उसे मिली हर वेदना
की सूचना मात्र
मुझे ही मिले
यूँ ही लोरिया गाता
रहूँ मै उसके लिए
और वो यूँ ही
दिन भर के धमाल
की थकन को
चैन से सो कर
खुद को तरोताजा
कर सके
अगले दिन के धमाल
के लिए

पर जानता हूँ मै
ये संभव नहीं है
एक दिन ऐसा आएगा
मै उसके कलरव से
नहीं जागूँगा
उससे आदेश नहीं
पाऊँगा
मुझे नहीं जगायेगी
और ना अपने नन्हे
हाथो से मुझे खिलाएगी
मेरी वस्तुओ पर
दूसरों का अधिकार वो
हंस कर सह लेगी
कई वेदनाओ
की शिकायत मुझसे
नहीं करेगी
मेरी बेसुरी लोरियों
में बसे स्नेह के सुरों
को नहीं समझ पायेगी
तब
जब वो थोड़ी
बड़ी हो जायेगी
तब
जब वो थोड़ी
बड़ी हो जायेगी......
तब
जब वो  थोड़ी
बड़ी हो जायेगी .....

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कुछ (ज्यादा) बड़ी हो गई है इसके लिए कुछ कर नहीं सकता मन की भावना शब्दों में ढलती गई और एक कविता बनती गई 

4 comments:

शिखा कौशिक said...

man ko chhoo lene vali abhvyakti .aabhar

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत प्यारी अभिव्यक्ति ..

वन्दना said...

्वक्त के साथ सब बदल जाता है कुन्दन्…………॥मगर प्यार और रिश्तो का आभास नही बदलता।

संजय भास्कर said...

बहुत अच्छी कविता, दी ! बहुत कुछ दिया सोचने और गुनने के लिये।
नमन!

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