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Thursday, June 2, 2011

मेरे दर्द का भान


मेरी आँखों से हमेशा ही
आंसू गिरते रहते हैं
मेरे दिल मे कोई दर्द
हमेशा ही बना रहता है

चेहरे पर कुछ
दर्द भरी लकीरे
स्थायी तौर पर
अपने आशियाना बना चुकी है


और हवा के हर झोंके के साथ
एक सिहरन मेरी हड्डियों
के साथ साथ आत्मा मे भी
दर्द की एक लहर दौडा देती हैं


ये दर्द और भी तब बढ़ जाता है
जब मेरा आत्मसम्मान
तुम्हारे अहंकार की बलिवेदी
पर बलि चढ जाता है


और तुम मुझे
मेरे प्रेम के समर्पण के कारण
जब तुम्हारे सम्मुख
झुका हुआ देखती हो तो


अहंकार के धन से धनी हो कर
तुम खुद को श्रेष्ठता का
प्रतिबिम्ब मान लेती हो
और अहंकार से बनी
ईंटो की एक और
मंजिल पर चढ जाती हो


और मेरे समर्पण को
अपनाकर मेरे प्रेम को पाने
के बजाय
तुम मेरे प्रेम से और
दूर होती जाती हो


तुम्हारी इस उपेक्षा से
मेरे अंदर उपजी वेदना
को देख कर तो


पत्थरों का दिल भी
पिघल जाता है
रेगिस्तान की सूखी
रेत को भी आंसू आ जाते हैं
समंदर भी दर्द से
तड़प उठता है
और मेरे जीवन मे
अँधेरा दूर करने को जुगनूओं
का समूह चला आता है


पर मेरे दिल मे
एक ही सवाल आता है


बस जाने क्यों
तुम्हारा ही दिल नहीं
पिघलता
तुम्हे ही रोना नहीं
आता
तुम्हे ही मेरे दर्द का भान
नहीं होता
और जाने क्यों मेरे जीवन मे
तुम्हे अँधियारा ही भाता है

2 comments:

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

दिल का दर्द शब्दों में उतरा है ......
व्याकुल ह्रदय की वेदना कविता बनी है.......भावपूर्ण

vandana gupta said...

इतनी गहन वेदना……………ऐसा चित्रण जैसे किसी को सामने बैठाकर लिखा हो………बेहद संवेदनशील्।

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