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Saturday, June 4, 2011

हे विलोम, तुम और मै



हे विलोम,

हर रोज तडके, सूरज के जागने के पहले
तूम भी जग जाते हो, और मै भी जग जाता हूँ

और उसके बाहर निकलने के पहले
तूम भी घर से निकल जाते हो, मै भी घर से निकल जाता हूँ

हम दोनों मे फर्क सिर्फ इतना ही है

तुम हर सुबह, तुम्हारे बढे हुए पेट को
कम करने की खातिर, जोगर्स पार्क के चक्कर लगाते हों

और मै हर सुबह ,मेरे पीठ से चिपक रहे

खाली पेट को भरने के लिए मजदूर चौक पर खड़ा हों जाता हूँ

हर सुबह पसीना तुम भी बहाते हों
और पसीना मै भी बहाता हूँ

हम दोनों मे फर्क सिर्फ इतना ही है

तुम पसीना बहा कर थोडा वजन घटाते हों
और मै पसीना बहा कार कुछ रूपये कमाता हूँ

तुम पसीने की गंध को बदबू कह कर
नकली सुगंधो से छुपाते हों

और मै उस गंध के निकलने पर ही
चार निवाले खा पाता हूँ

हर सुबह

तडके सूरज के जागने के पहले
तूम भी जग जाते हों और मै भी जग जाता हूँ
 

तुम जोगर्स पार्क के चक्कर लागते हों
मै मजदूर चौक पर खड़ा हों जाता हूँ
*********************************

भाई Nagendra Pareek जी की एल्बम से चुराई हुई फोटो और पंक्तियों पर ये लिखने की कोशिश की थी आपका प्यार चाहूँगा

3 comments:

शिखा कौशिक said...

yah vilom bharat me sarvatr faila huaa hai .sarthak post .aabhar .

वन्दना said...

आपकी रचना यहां भ्रमण पर है आप भी घूमते हुए आइये स्‍वागत है
http://tetalaa.blogspot.com/

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत अच्छे से व्यक्त किया है यह विलोम ..

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