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Tuesday, October 18, 2011

तेरा तकिया मेरे कंधे से बहुत जलता है

तेरा तकिया,
मेरे कंधे से बहुत जलता है
मै सर रख लूं
तो उसका दम निकलता है

मेरे काँधे की शिकायत
बिस्तर से भी करता है
तुझ पर उसका हक
जताने का दम भरता है
खुद की तपिश से
वो ठण्ड मे भी पिघलता है

तेरा तकिया,
मेरे कंधे से बहुत जलता है

4 comments:

Rajesh Kumari said...

bahut khoob.

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
अवगत कराइयेगा ।

http://tetalaa.blogspot.com/

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

:) बहुत खूब

दिगम्बर नासवा said...

बहुत खूब ... तकिये की कहानी भी क्या कहती है ... लाजवाब ...

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