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Saturday, January 17, 2015

फिर से पिता को पाने का दिल करता है

हर याद, हर मंजर ऐसे लगता है
जैसे बिलकुल कल ही की बात है
पर अब इस दिल में और कुछ नहीं
बस पिता को पाने की फरियाद है

कहने को कितना कुछ है मन में
कितना कहूं, कितना छुपा लूं
और कुछ चाहत नहीं है मेरी
सिर्फ पिता के सीने से लग जाने का मन करता है|
फिर पिता को फिर से पाने का मन करता है |

जब बचपन में गलतियाँ करता था
तो पिता जी गलतियाँ बताया करते थे
कभी प्यार से कभी डांट से
सही गलत समझाया करते थे

आज भी वैसे ही
छोटी छोटी गलतियाँ दोहराने का मन करता है |
आज भी वैसे ही
फिर पिता से डांट खाने का मन करता है |

गाँव की धुल भरी सडको पर खेल कर
या होली के रंग जब दोस्तों उड़ाते थे
तो कभी तालाब पर कभी नल पर
पिता जी ही मल मल कर नहलाते थे  

आज भी वैसे ही
खुद को गन्दा हो जाने का मन करता है |
आज भी वैसे ही
फिर पिता के हांथो नहाने का मन करता है |

जब बचपन में माँ पिता के पैर दबाती थी
तब शरारत मुझे भी तो बहुत आती थी
लिहाफ के नीचे पिता के पैरो पर पैर रख
माँ से खुद शैतानी के अपने पैर दबवाता था,

आज भी वैसे ही
पिता पैरों पर पैर रख, लेट जाने का मन करता है |
आज भी वैसे ही
पिता के बदले खुद के पैर दबवाने का मन करता है

जब नाकाम होता था कभी कही भी
तो पिता ही थे जो मेरा हौसला बढ़ाते थे
जब सफलता मिलती मुझे कभी भी
वो जी भर के अपनी खुशियाँ दिखाते थे
हर शख्श को मिठाइयाँ खिलाते

आज भी वैसे ही
पिता को उपलब्धियां बताने का मन करता है |
आज भी वैसे ही
पिता से मिठाइयाँ बंटवाने का मन करता है |

कहने को कितना कुछ है मन में
कितना कहूं, कितना छुपा लूं
और कुछ चाहत नहीं है मेरी
सिर्फ पिता के सीने से लग जाने का मन करता है|

इतना होते हुए भी सब बेकार ही है
इस सब कुछ को खो दूं तो भी रंज नहीं

सिर्फ पिता को फिर से पाने का मन करता है |
और कुछ चाहते नहीं है मेरी
सिर्फ फिर से पिता के सीने से लग जाने का मन करता है |

5 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सार्थक प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (18-01-2015) को "सियासत क्यों जीती?" (चर्चा - 1862) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Rita Menghrani said...

It made me cry. Had a thought to call u bt ur ph was not reachable..... :))

(कुंदन) said...

धन्यवाद शाश्त्री जी... और पोस्ट को चर्चा में स्थान देने के लिए भी धन्यवाद

प्रतुल वशिष्ठ said...

कुंदन जी, आपकी कविता को पढ़कर भाव-विभोर हो गया। आपकी अभिव्यक्ति शैली ने पुत्र के लिए 'पिता' के समर्पण को जिन शब्दों में आँका है वे किसी भी प्रकार 'माँ' के स्थान से कमतर स्थान नहीं रखते। वाह, अब तक 'माँ' पर ही रचनाओं ने भाव-विभोर किया था। आपकी इस रचना ने मुझे नत-मस्तक करने को बाध्य किया है।

वाह कुंदन जी, आपको इस रचना के लिए ढेर सारी बधाई!

इस रचना को जब तक बीस-तीस बार पढ़कर अपने परिवार और साथियों को नहीं सुनाऊँगा चैन नहीं आएगा। :)

प्रतुल वशिष्ठ said...



लिहाफ़ में घुसकर माँ से अपने पाँव दबवाना …………ढेर सारी बचपन की शरारतों में इस शरारत को जोड़ लेने का मन करता है। फिर से बचपन में लौटजाने का मन करता है।

इस समय महान कवयित्री श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान जी की प्रसिद्ध रचना 'बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी' याद हो आई। आपकी रचना भी उस रचना से कम दमदार नहीं ।

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