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Tuesday, August 9, 2011

मै नहीं जानता


आज आँखों से रह रह कर कूछ टपक रहा है
है ये लहूँ या तेरी याद का समन्दर मै नहीं जानता

आज एक उबाल भी बाहर बह जाना चाहता है
है ये मोहब्बत या गम तेरी जुदाई का मै नहीं जानता

आज एक दर्द रह रह कर दिल पर दस्तक देता है
है ये पुराना जख्म या घाव तेरे न होने का मै नहीं जानता

खुद के होने पर रह रह कर एक सवाल उठता है
तेरे जाने के बाद से मै हूँ भी या नहीं हूँ मै नहीं जानता

तू गई लोगो ने कहा, तू बेवफा है तुझे मुझ से प्यार नहीं
मैने कहा, कहो जो चाहो, तुम्हारे कहे को मै नहीं मानता

3 comments:

वन्दना said...

दर्द से सराबोर रचना।

Rajesh Kumari said...

a blind trust in love.dil ki aavaj bahut khoob ,achchi marmik rachna.

संजय भास्कर said...

ह्र्दय की गहराई से निकली अनुभूति रूपी सशक्त रचना

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