Ads 468x60px

Pages

Sunday, July 3, 2011

माशूक का वादा और मेरा इन्तेजार

माशूक ने जाते हुए कहा था हमसे
ना लगाना लबों से जालिम शराब को
जल्द ही आएगी वो लौट कर मेरे पास
तब जितना चाहे पी लूँगा मै हुस्नोशबाब को

उस पल से मैंने सुराही को लबो से लगाया नहीं
मेरी बेरुखी से नाराज, साकी ने भी बुलाया नहीं
इन्तेजार करता हूँ हर रोज यार का अब तो मै
पर न खुद आई, और कोई पैगाम भी भिजवाया नहीं

सब कहते रहे मुझसे मेरा, माशूक बेवफा गया है
मेरे प्यार का हर कतरा उसके दिल से फ़ना हो गया है
उसकी आँखों से न पी कर, सुराही को लगाया था मुह से
मुमकिन है मेरा दिलबर, इस बात पर मुझसे खफा हो गया है


कोई बता दे उनको, लबो पर लगी वो सुराही खाली थी
मेरी आँखे उनके एक दीदार की खातिर बस सवाली थी
कैसे बताऊँ मेरी प्यास की तडप, भूल गई खुद का वादा भी 
वादे के मुताबिक़ वो ही तो मुझे, अपनी आँखों से पिलाने वाली थी

2 comments:

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (4-7-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

अजय कुमार said...

अच्छी रचना ,बधाई

Post a Comment

 
Google Analytics Alternative